शिखर तक डॉ. बी.आर. अंबेडकर का सफर 14 अप्रैल 2026 बुलढाणा मेहकर
इतिहास के पन्नों से एक नायक का उदय
यह कहानी 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे 'महू' से शुरू होती है
एक ऐसा बालक जिसका जन्म 'महार' जाति में हुआ था, जिसे उस समय समाज
अछूत' मानता था। लेकिन नियति ने उस बालक के हाथों में भारत का भविष्य लिखने की जिम्मेदारी सौंपी थी
संघर्ष के वो दिन: जब प्यास भी एक सजा थी
भीमराव की कहानी संघर्षों की पराकाष्ठा है। स्कूल में उन्हें प्याऊ से पानी पीने की अनुमति नहीं थी।
चपरासी ऊपर से पानी डालता था, तब वे अपनी प्यास बुझा पाते थे। जिस दिन चपरासी नहीं आता, उस दिन बालक भीम को प्यासा ही रहना पड़ता था कलम की ताकत से बदलाव
समाज ने उन्हें अपमानित किया, लेकिन भीमराव ने इसे नफरत में नहीं बदला
उन्होंने तय किया कि वे समाज की इस व्यवस्था को 'तलवार' से नहीं बल्कि 'कलम' से बदलेंगे उनके लिए ऊंच-नीच या बड़ाछोटा कोई खराब नहीं था, वे सबको एक समान मानते थे
आधुनिक भारत की नींव और योगदान
बाबासाहेब का काम केवल एक जाति तक सीमित नहीं था। उनके योगदान को इन मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है
मजदूरों के हित: पहले मजदूरों से 12-14 घंटे काम लिया जाता था बाबासाहब ने इसे घटाकर 8 घंटे करवाया
महिला अधिकार: 'हिंदू कोड बिल' के जरिए उन्होंने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार और स्वावलंबन दिलाया
अर्थव्यवस्था: भारत का RBI उन्हीं के आर्थिक शोध पर टिका हैसं विधान और राष्ट्र का निर्माण
1947 में आजादी के बाद देश को चलाने के लिए 'नियमों की किताब' चाहिए थी
बाबासाहब को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने 2 साल, 11 महीने और 18 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संविधान तैयार किया, जिसने हर नागरिक को बराबरी का हक दिया
विरासत और आज का समय
आज 14 अप्रैल 2026 को भी उनकी जयंती धूमधाम से, डीजे और 'जय भीम' के नारों के साथ मनाई गई। जहाँ कुछ लोग इतिहास को भूलते जा रहे हैं, वहीं बाबासाहेब के विचार हमें याद दिलाते हैं
कि उन्होंने देश के लिए कितनी कुर्बानियाँ दीं। डॉ. अंबेडकर की जयंती मनाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि समानता के उस संघर्ष का उत्सव है
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