हाल ही में दिल्ली बम विस्फोट मामले की जांच कर रही एनआईए (NIA) को कुछ बड़ी जानकारियां मिली हैं आतंकी डॉ. मुजम्मिल शकील से पूछताछ के बाद विस्फोटक छिपाने के नए ठिकानों का खुलासा हुआ है
पहचान छुपाकर रहना: मुजम्मिल ने फरीदाबाद के खोरी जमालपुर गाँव में खुद को कश्मीर का फल व्यापारी बताकर एक कमरा किराए पर लिया था
इंडिया में जब भी फिल्म बनती है पाकिस्तान को सलाम से शुरू होती है और ख़तम भी पाकिस्तान से होती है क्योंकि आतंकवादी सारे वहीं पर है ना बेस हुए उसके बारे में
देसी फिल्में धविंदर हो गई 26/11
विस्फोटक का ठिकाना: बताया जा रहा है कि लगभग 25-40 किलो विस्फोटक पहले अल-फलाह यूनिवर्सिटी के पास और फिर फतेहपुर तगा गाँव में शिफ्ट किया गया
तकनीकी मदद: मुख्य आरोपी जसीर बिलाल वानी की हिरासत 7 दिनों के लिए बढ़ गई है। उस पर ड्रोन मॉडिफाई करने और रॉकेट बनाने में तकनीकी सहायता देने का आरोप है
एक ब्लॉगर के तौर पर जब मैं ऐसी खबरें देखता हूं, तो मन में कई सवाल उठते हैं
अक्सर देखा गया है कि फिल्मों से लेकर न्यूज़ चैनल्स तक, एक खास पैटर्न सेट कर दिया गया है जब भी आतंकवाद की बात आती है, तो सारा फोकस एक ही समुदाय की तरफ मोड़ दिया जाता है
हम अक्सर '26/11' जैसी घटनाओं पर बनी फिल्में देखते हैं। लोग इन्हें पसंद भी करते हैं, लेकिन फिल्मों में अक्सर मिर्च-मसाला लगाकर कहानियों को बड़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है
पर्दे पर जो दिखता है, समाज उसे ही सच मान लेता है नतीजा यह होता है कि आम जिंदगी में भी लोग एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगते हैं
अपनी फिल्मों के अंदर भी देखा होगा कि आतंकवाद भी पाकिस्तान से जाता है सबसे ज्यादा
कभी-कभी लगता है कि ऐसी खबरों का इस्तेमाल सिर्फ न्यूज़ रेटिंग्स के लिए नहीं, बल्कि चुनावी फायदों के लिए भी किया जाता है। जब तक हम 'असली खबर' और 'बनाई गई कहानी' के बीच का अंतर नहीं समझेंगे, तब तक समाज में दूरियां बढ़ती रहेंगी
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